बिहार चुनाव की पारदर्शिता पर सवाल: Tejashwi यादव के आरोपों की गहराई से पड़ताल
बिहार की राजनीति फिर गर्म है—इस बार मुद्दा न कोई रैली है, न कोई गठबंधन, बल्कि लोकतंत्र की जड़ें।
राजद नेता Tejashwi यादव ने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा है कि एनडीए सरकार चुनाव परिणामों में हेरफेर की तैयारी कर रही है।
यह आरोप महज़ बयान नहीं, बल्कि जनता के विश्वास पर सीधा हमला माना जा रहा है।
चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा है—क्या बिहार में वोट की गिनती ईमानदारी से होगी या राजनीति फिर “खेल” दिखाएगी?
Tejashwi यादव के आरोप: हेरफेर का दावा
Tejashwi यादव ने हालिया भाषण में कहा कि सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) से छेड़छाड़ कर नतीजे अपने पक्ष में मोड़ने की साजिश रच रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर विपक्षी मतदाताओं को डराने और रोकने की कोशिश की जा रही है—
जैसे, कुछ इलाकों में पुलिस चौकियां खास वर्ग के लोगों को रोकती दिख रही हैं।
Tejashwi यादव ने अपनी सभाओं में जनता से अपील की—
“अगर हम नहीं जागेंगे, तो वोट देंगे और गिनती में गायब हो जाएगा।”
उनके बयान ने बिहार में उन लोगों की आशंकाओं को हवा दी है जो पहले से चुनाव प्रक्रिया पर शक जताते रहे हैं।
राज्य में जहाँ जातीय समीकरण बेहद गहरे हैं, वहां थोड़ी भी अनियमितता का असर बड़ा हो सकता है।
बिहार का चुनावी इतिहास: आरोपों की जड़ें पुरानी हैं
बिहार का चुनावी इतिहास विवादों से भरा रहा है।
90 के दशक में “बूथ कैप्चरिंग” आम बात थी—जहाँ दबंग नेता मतदान केंद्रों पर कब्ज़ा कर लेते थे।
कई जगह पैसे और शराब के ज़रिए वोट खरीदने की खबरें आती रही हैं।
2015 में नीतीश कुमार के राजनीतिक गठबंधन पलटने के बाद भी “पर्दे के पीछे की डील” की चर्चा खूब हुई।
2020 के विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर EVM गड़बड़ी के आरोप लगे थे, जहाँ जीत का अंतर महज़ कुछ सौ वोटों का था।
यही पृष्ठभूमि Tejashwi के आरोपों को और वजन देती है—
क्योंकि जनता पहले से ही शंकालु है कि “कहीं खेल फिर से न हो जाए।”
जनता के विश्वास और लोकतंत्र पर असर
जब विपक्ष का नेता खुद चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए,
तो जनता में शक बढ़ना तय है।
लोग अब सिर्फ़ बेरोज़गारी या विकास की बात नहीं कर रहे—
बल्कि ये सोच रहे हैं कि “क्या मेरा वोट सही गिना जाएगा?”
यह संदेह मतदान प्रतिशत को भी प्रभावित कर सकता है।
कम भरोसा, कम वोट—और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी है।
सोशल मीडिया पर भी माहौल गर्म है—
मीम्स, आरोप, और बहसों की बाढ़ आई हुई है।
चुनावी चर्चा अब मुद्दों से हटकर “कौन सिस्टम को नियंत्रित कर रहा है” पर पहुँच गई है।
एनडीए की प्रतिक्रिया: सख़्त इनकार और पलटवार
तेजस्वी के आरोपों पर भाजपा और जेडीयू ने तुरंत पलटवार किया।
भाजपा नेताओं ने कहा—
“यह विपक्ष की हताशा है, हार का डर पहले से दिख रहा है।”
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी ने कहा कि
“हमारे शासन में चुनाव आयोग की निगरानी में हमेशा निष्पक्ष मतदान हुआ है।”
एनडीए ने उल्टा राजद पर “झूठ फैलाने और भ्रम पैदा करने” का आरोप लगाया।
टीवी चैनलों पर बहसें तेज हैं—
एक ओर “साजिश की कहानी” है, दूसरी ओर “सिस्टम पर भरोसा”।
बिहार की राजनीति में यह नया मोड़ गर्मी बढ़ा रहा है।
EVM सुरक्षा और चुनाव आयोग की व्यवस्था
भारत की चुनाव प्रणाली कई सुरक्षा परतों से बनी है।
मतदान से पहले हर मशीन का मॉक पोल किया जाता है।
VVPAT (वोटर पेपर ट्रेल) के ज़रिए मतदाता अपने वोट की पर्ची देख सकता है।
सभी मशीनों को कड़ी सुरक्षा में सील किया जाता है,
और उनकी निगरानी पार्टी एजेंटों की मौजूदगी में होती है।
चुनाव आयोग के अनुसार, अब तक की जांचों में 99% से ज़्यादा सटीकता रही है।
हालाँकि कुछ तकनीकी विशेषज्ञ पूरे VVPAT की गिनती की मांग करते हैं,
क्योंकि “सिस्टम मज़बूत है” कहना और “हर वोट पर भरोसा होना” दो अलग बातें हैं।
प्रशासन और राज्य मशीनरी की भूमिका
जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों की भूमिका सबसे अहम है।
यही लोग मतदान केंद्रों की व्यवस्था और शांति बनाए रखते हैं।
लेकिन कई बार विपक्ष इन पर पक्षपात के आरोप लगाता रहा है।
कुछ इलाकों में शिकायतें हैं कि विरोधी दलों की रैलियों को अनुमति देने में देरी की गई,
या मतदाता सूचियों में गड़बड़ी मिली।
चुनाव आयोग ने ऐसे मामलों में केंद्रीय पर्यवेक्षकों और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की है
ताकि स्थानीय प्रभाव कम किया जा सके।
सोशल मीडिया पर अफवाहें और फेक न्यूज का खतरा
व्हाट्सएप ग्रुपों और फेसबुक पेजों पर “EVM हैक” और “बूथ घोटाले” की अफवाहें फैल रही हैं।
2020 में भी बिहार चुनाव के दौरान डीपफेक वीडियो और फर्जी क्लिप्स वायरल हुए थे।
अब चुनाव आयोग डिजिटल निगरानी को और कड़ा कर रहा है—
फेक न्यूज़ फैलाने वालों पर जुर्माना और केस दर्ज किए जा रहे हैं।
फिर भी, ग्रामीण इलाकों में फैली अफवाहें सच्चाई से ज़्यादा असर करती हैं।
इस डिजिटल दौर में लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा भ्रम और अविश्वास है।
चुनाव आयोग की कार्रवाई: भरोसा बहाल करने की कोशिश
तेजस्वी के आरोपों के बाद चुनाव आयोग ने तुरंत जांच टीम भेजी।
संवेदनशील जिलों में EVM स्टोरेज की जांच हुई,
सभी मशीनों के सील रिकॉर्ड की समीक्षा की गई।
केंद्रीय बलों की तैनाती बढ़ाई गई—
200 से ज़्यादा कंपनियाँ उन इलाकों में लगाई गईं जहाँ पहले गड़बड़ी की शिकायतें आई थीं।
इसके अलावा, दिल्ली से आए स्वतंत्र पर्यवेक्षक सीधे आयोग को रिपोर्ट दे रहे हैं।
नियम भी सख़्त हुए—
48 घंटे पहले प्रचार बंद,
नकद वितरण या उपहार पर रोक,
और घृणास्पद भाषण पर कार्रवाई।
इन सबका उद्देश्य साफ है—“जनता का भरोसा लौटाना।”
लोकतंत्र की साख बचाने की चुनौती
तेजस्वी यादव के आरोपों ने बिहार की राजनीति को हिला दिया है।
एक तरफ़ एनडीए का विश्वास है कि व्यवस्था निष्पक्ष है,
दूसरी ओर विपक्ष का अविश्वास है कि खेल पहले से तय है।
सच जो भी हो, चुनौती चुनाव आयोग के सामने है—
उसे यह साबित करना होगा कि हर वोट की कद्र होती है।
मुख्य बातें:
बिहार के इतिहास में चुनावी पारदर्शिता पर हमेशा सवाल रहे हैं।
विपक्ष के आरोप जनता में संदेह बढ़ाते हैं, जो मतदान को प्रभावित कर सकता है।
आयोग की सख्ती और पारदर्शिता ही लोकतंत्र को बचाए रख सकती है।
अंततः, जनता के जागरूक रहने से ही लोकतंत्र मज़बूत होता है।
आपका वोट, आपकी नज़र, और आपका सवाल ही इस सिस्टम की गारंटी हैं।
तो अगली बार मतदान केंद्र जाएं—और सिर्फ़ वोट न दें, लोकतंत्र की रक्षा भी करें।
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