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Chirag पासवान की बेबाक स्वीकारोक्ति: ‘एक डिज़ास्टर था, फिल्में मेरे लिए बनी ही नहीं थीं’

बिहार की राजनीति के रणक्षेत्र से लेकर बॉलीवुड की चमकदार दुनिया तक—Chirag पासवान का सफर जितना अनोखा है, उतना ही आश्चर्यजनक भी। आज वे लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चेहरे हैं, तेज़ और साफ़ राजनीतिक फोकस के साथ। लेकिन एक दशक पीछे जाएँ, तो वे पूरी तरह अलग दुनिया—फिल्मों—का सपना देख रहे थे।
अब वे खुलकर मानते हैं कि उनका फिल्मी सफर “एक डिज़ास्टर” था।

राम विलास Chirag पासवान जैसे दिग्गज नेता की विरासत में पले चिराग ने राजनीति में मजबूती से कदम रखने से पहले फिल्मों में हाथ आजमाया। लेकिन असफलता ने उन्हें उसी दुनिया में वापस धकेल दिया, जहाँ वे सबसे ज़्यादा फिट थे—राजनीति।
यह लेख उनकी उसी स्वीकारोक्ति, फिल्मी करियर की समीक्षा, नुकसान की कहानी और राजनीति में उनकी मज़बूत वापसी पर रोशनी डालता है।

फिल्मी सफर की शुरुआत: मिली विरासत, बढ़ा दबाव

विरासत की छाया: उम्मीदें बनाम हकीकत

जब Chirag पासवान ने अपनी बॉलीवुड एंट्री का ऐलान किया, मीडिया और प्रशंसकों के बीच हलचल मच गई।
राम विलास पासवान के बेटे होने के नाते, उम्मीदें बेहद ऊँची थीं।

लेकिन राजनीति की भीड़ और कैमरे की रोशनी एक जैसी नहीं होतीं।
यहाँ दलीलें नहीं, अभिनय चलता है। सवाल उठने लगे—क्या चिराग इस दुनिया में फिट बैठते हैं?

बिहार के लोग गर्व और संदेह के बीच बँटे हुए थे। विरासत बड़ी थी, लेकिन अभिनय उससे कहीं बड़ा चैलेंज।

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डेब्यू फिल्म की चर्चा: मिलेंगे मिलेंगे (2011)

Chirag की पहली फिल्म मिलेंगे मिलेंगे कई देरी के बाद 2011 में रिलीज़ हुई।
एक रोमांटिक ड्रामा, जिसमें प्यार, बिछड़न और दूसरी मौके की कहानी थी।
चिराग एक उम्मीदों से भरे युवा नायक के रूप में नज़र आए।

रिलीज़ से पहले अपेक्षाएँ बढ़ गई थीं—लेकिन फिल्म पुरानी स्टाइल की लगी।
बॉक्स ऑफिस शुरू में ठीक रहा, फिर बुरी तरह गिर गया।

उद्योग की प्रतिक्रिया और बॉक्स ऑफिस वास्तविकताएँ

ट्रेड पंडितों की राय मिली-जुली रही।
कुछ ने Chirag को “फ्रेश फेस” कहा, लेकिन अधिकांश ने अभिनय को कमजोर बताया।

बजट: लगभग 10 करोड़
कलेक्शन: करीब 5 करोड़
यानी आधे से ज़्यादा पैसे डूब गए।

मुख्य कारण बताए गए:

  • सितारों की कमी

  • कमजोर प्रमोशन

  • अभिनय में कमी

  • पुरानी शैली की कहानी

बाक्स ऑफिस सफर:

  • ओपनिंग वीकेंड: 2 करोड़ से कम

  • आगे की कमाई: तेज़ी से नीचे

बॉडीगार्ड जैसी फिल्मों के बीच चिराग की फिल्म चुपचाप गुम हो गई।

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‘डिज़ास्टर’ क्यों?—समीक्षाओं और प्रदर्शन का विश्लेषण

क्रिटिक्स की राय: अभिनय में कच्चापन

समीक्षकों ने कहा:

  • संवाद पढ़ते हुए लगते थे

  • भावनाओं की कमी

  • स्क्रीन प्रेज़ेंस कमज़ोर

  • कैमरे के सामने असहज

राजनीति का मंच और कैमरे का फ्रेम दो बिल्कुल अलग दुनिया हैं—यह फर्क साफ दिखा।

दर्शकों और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया

दर्शकों के बीच मिश्रित माहौल रहा।
कुछ ने “अपने लड़के” के लिए तालियाँ बजाईं।
लेकिन कई लोगों ने सोशल मीडिया पर मीम्स बनाए।

एक वायरल पोस्ट में लिखा गया:
“रैलियों से रील तक—फिर वापस रैलियों में ही ठीक हैं!”

बातचीत में हास्य भी था और निराशा भी।

साथी डेब्यू कलाकारों से तुलना

2011 में ही कई मजबूत डेब्यू हुए:

  • इमरान खान—रोमांटिक कॉमेडी के चहेते

  • प्रतीक बब्बर—नैचुरल अभिनय

  • शोर इन द सिटी—स्मॉल फिल्में भी हिट

उनके मुकाबले चिराग की फिल्म पीछे रह गई।

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अनकही वजहें: राजनीति में वापसी क्यों हुई?

बाहरी दबाव और पार्टी की ज़रूरतें

उसी समय LJP चुनौतियों से गुजर रही थी।
पार्टी नेताओं ने चिराग को वापस बुलाया—फिल्में सिर्फ “भटकाव” लग रही थीं।

NDAlliance की राजनीति भी गंभीर थी।
तीन घंटे की फिल्में राजनीति के लंबे सीज़न से मेल नहीं खातीं।

Chirag का स्वयं मूल्यांकन

हाल ही में चिराग ने साफ कहा:
“एक डिज़ास्टर था, मैं फिल्मों के लिए बना ही नहीं था।”

राजनीतिक नेताओं में ऐसी ईमानदारी कम दिखती है।
यह आत्मबोध उनकी परिपक्वता दिखाता है।

लोगों को लगा—यह नेता सच्चाई से नहीं डरता।

न Turning Point: रामविलास पासवान की बिगड़ती सेहत

जैसे-जैसे राम विलास Chirag पासवान की तबीयत खराब हुई, चिराग ने परिवार और पार्टी को प्राथमिकता दी।
फिल्में पीछे छूट गईं।
यह वह क्षण था जब उन्होंने राजनीति को अपना भविष्य मान लिया।

सीख और रणनीति: पर्दे से राजनीति तक

जनता के लिए असली चेहरे की अहमियत

फिल्मों ने चिराग को सिखाया—अपने असली रूप में रहना ही बेहतर है।
आज उनकी सभाओं में बातचीत सरल और वास्तविक लगती है।

असफलता को राजनीतिक कहानी बनाना

चिराग अब अपनी फिल्मी असफलता को ईमानदारी से बताकर लोगों से जुड़ते हैं।
जवानी से बात करते हैं—कैसे गिरकर उन्होंने दोबारा लड़ना सीखा।

यह विनम्रता उनकी छवि मजबूत करती है।

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रणनीतिक बदलाव: अभिनय से अधिक राजनीति पर ध्यान

फिल्मों के बाद चिराग ने युवाओं, नौकरी, विकास और शिक्षा पर फोकस किया।
2020 चुनावों में LJP (RV) ने उनके नेतृत्व में दमदार उपस्थिति दर्ज की।

अब वे सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं—लेकिन अभिनय नहीं—वास्तविक मुद्दों के साथ।

एक युग का अंत, नेता का उदय

Chirag पासवान का फिल्मी करियर भले ही “डिज़ास्टर” रहा हो, लेकिन उससे मिली सीख ने उनकी राजनीतिक राह को मजबूत बनाया।
गलतियां उन्होंने मानीं—और वही ईमानदारी उन्हें जनता के करीब लाती है।

आज वे बिहार की राजनीति में उभरते नेताओं में शुमार हैं।
क्या यह सच्चाई और खुलेपन वाली छवि उन्हें अगली बड़ी सफलता दिलाएगी?

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