केनेस्सेट में विपक्ष का वॉकआउट: PM मोदी के भाषण पर “इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं” रुख
जुलाई 2017 का वह क्षण काफी चर्चा में रहा, जब भारत के PM Narendra Modi इज़राइल की संसद Knesset में ऐतिहासिक संबोधन देने पहुंचे। जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, कुछ सांसद अपनी सीटों से उठे और सदन से बाहर चले गए।
यह दृश्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बना, लेकिन इज़राइली विपक्ष का कहना साफ था—“यह विरोध मोदी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी सरकार के खिलाफ है।”
वॉकआउट का संदर्भ: कौन और क्यों?
यह वॉकआउट मुख्य रूप से अरब-इज़राइली दलों और कुछ वामपंथी सांसदों द्वारा किया गया था।
प्रमुख भागीदार
Joint List (संयुक्त अरब दलों का गठबंधन)
Meretz (वामपंथी पार्टी)
नेता: Ayman Odeh
इन नेताओं ने कहा कि उनका विरोध PM Benjamin Netanyahu की नीतियों के खिलाफ था—खासकर फिलिस्तीनी मुद्दों और अरब समुदायों के अधिकारों को लेकर।
ओदेह ने स्पष्ट कहा कि यह कदम मोदी के खिलाफ नहीं था, बल्कि घरेलू नीतियों पर असहमति जताने के लिए था।

क्या यह कूटनीतिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन था?
विदेशी नेताओं के संसद में भाषण के दौरान आम तौर पर पूरा सदन उपस्थित रहता है। वॉकआउट को परंपरा से हटकर कदम माना जाता है।
हालांकि, इज़राइल की संसद में पहले भी इस तरह के विरोध हुए हैं। यह वहां की जीवंत लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा माना जाता है, जहां विपक्ष अक्सर प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराता है।
इस बार भी सरकार ने इसे सीमित राजनीतिक विरोध बताकर आगे बढ़ने का फैसला किया।
“इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं” — विपक्ष की रणनीति
विपक्ष ने बार-बार दोहराया कि उनका विरोध भारत या मोदी के खिलाफ नहीं है।
यह रणनीति इसलिए अहम थी ताकि:
भारत के साथ संबंधों पर नकारात्मक असर न पड़े
विरोध का फोकस पूरी तरह घरेलू राजनीति पर रहे
अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की जा सके
इस तरह विपक्ष ने अंतरराष्ट्रीय मंच का उपयोग घरेलू संदेश देने के लिए किया।

भारत की प्रतिक्रिया
भारत की ओर से कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई। PM मोदी और भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस घटना को बड़ा मुद्दा नहीं बनाया।
नई दिल्ली ने इस यात्रा के मुख्य उद्देश्यों—रक्षा सहयोग, कृषि तकनीक, जल प्रबंधन और व्यापार—पर ही ध्यान केंद्रित रखा।
यह एक परिपक्व कूटनीतिक रुख माना गया।
क्या भारत-इज़राइल संबंधों पर असर पड़ा?
वॉकआउट के बावजूद द्विपक्षीय संबंध मजबूत बने रहे।
प्रमुख सहयोग क्षेत्र
रक्षा: इज़राइल भारत के प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में से एक है।
कृषि: ड्रिप सिंचाई और शुष्क खेती तकनीक में सहयोग।
जल प्रबंधन: जल पुनर्चक्रण और संरक्षण परियोजनाएं।
तकनीक व स्टार्टअप: साइबर सुरक्षा और नवाचार में साझेदारी।
2017 के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार और रक्षा समझौतों में वृद्धि हुई।
स्पष्ट है कि एक संसदीय विरोध ने रणनीतिक साझेदारी को प्रभावित नहीं किया।
इज़राइल के भीतर राजनीतिक असर
इस घटना ने इज़राइल की आंतरिक राजनीतिक विभाजन को उजागर किया।
विपक्ष ने इसे अपने समर्थकों के लिए साहसिक कदम बताया।
सरकार ने इसे गैर-जिम्मेदाराना कदम कहकर आलोचना की।
जनमत सर्वेक्षणों में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली—कुछ लोगों ने समर्थन किया, जबकि कई ने इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अनुचित माना।
घरेलू राजनीति, अंतरराष्ट्रीय मंच
केनेस्सेट वॉकआउट मूल रूप से इज़राइल की आंतरिक राजनीति का हिस्सा था, न कि भारत के खिलाफ कोई संदेश।
“इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं” वाला रुख यही दर्शाता है कि विपक्ष का निशाना अपनी ही सरकार थी।
इसके बावजूद, भारत-इज़राइल संबंध मजबूत बने रहे और रणनीतिक सहयोग आगे बढ़ता रहा।
यह घटना दिखाती है कि लोकतंत्र में विरोध संभव है, लेकिन मजबूत द्विपक्षीय संबंध अक्सर ऐसे प्रतीकात्मक घटनाक्रमों से प्रभावित नहीं होते।
PM मोदी ने मेरठ में भारत की सबसे तेज मेट्रो और नमो भारत कॉरिडोर का उद्घाटन किया।
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