‘Govt जनता को धीरे-धीरे जहर दे रही है’: ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी पर अरविंद केजरीवाल का हमला
हर बार जब कोई वाहन पेट्रोल पंप पर रुकता है, तो चालक की नजर सीधे डिजिटल मीटर पर जाती है। मई 2026 में भी पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें आम लोगों और कारोबारियों के लिए बड़ी चिंता बनी हुई हैं। इसी बीच दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal ने ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “Govt जनता को धीरे-धीरे जहर दे रही है।”
केजरीवाल का यह बयान केवल राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की नाराजगी को दर्शाता है जो लगातार बढ़ती महंगाई और ईंधन कीमतों से परेशान हैं। उनका कहना है कि पेट्रोल-डीजल के दामों में धीरे-धीरे हो रही वृद्धि आम आदमी की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर रही है।
‘धीमा जहर’ कहने के पीछे क्या है वजह?
अरविंद केजरीवाल ने अपने बयान में कहा कि ईंधन कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी लोगों की जेब पर लगातार बोझ डाल रही है। उनका तर्क है कि अचानक बड़ी बढ़ोतरी लोगों का ध्यान खींचती है, लेकिन छोटी-छोटी नियमित बढ़ोतरी लंबे समय में ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।
उन्होंने इसे “धीमा जहर” इसलिए कहा क्योंकि आम परिवार शुरुआत में बढ़े हुए खर्च को किसी तरह संभाल लेते हैं, लेकिन समय के साथ यही खर्च घरेलू बजट को बुरी तरह प्रभावित करने लगता है।

पेट्रोल-डीजल महंगा होने से कैसे बढ़ती है महंगाई?
ईंधन केवल वाहनों को चलाने का साधन नहीं है, बल्कि पूरे देश की सप्लाई चेन की रीढ़ है। सब्जियों से लेकर दवाइयों और निर्माण सामग्री तक लगभग हर सामान ट्रकों और अन्य परिवहन साधनों के जरिए बाजार तक पहुंचता है।
जब डीजल की कीमत बढ़ती है, तो ट्रांसपोर्ट कंपनियां अतिरिक्त लागत ग्राहकों पर डाल देती हैं। इसका असर सीधे खाने-पीने की चीजों, दवाओं और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर पड़ता है।
यही वजह है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें महंगाई दर यानी Consumer Price Index (CPI) पर बड़ा असर डालती हैं।
आम परिवारों पर बढ़ता आर्थिक दबाव
शहरी परिवारों के लिए ईंधन खर्च अब मासिक बजट का बड़ा हिस्सा बनता जा रहा है। नौकरी, स्कूल और अन्य जरूरी कामों के लिए लोग निजी वाहनों पर निर्भर हैं। ऐसे में पेट्रोल महंगा होने से दैनिक खर्च लगातार बढ़ता है।
कम आय वाले परिवारों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है। ऐसे परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, यात्रा और जरूरी जरूरतों पर खर्च करते हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य या बेहतर भोजन जैसी चीजों में कटौती करनी पड़ती है।
आखिर कैसे तय होती हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें?
भारत में ईंधन की कीमत कई स्तरों पर तय होती है। इसमें शामिल हैं:
- कच्चे तेल और रिफाइनिंग की लागत
- डीलर कमीशन
- केंद्र सरकार का एक्साइज ड्यूटी
- राज्य सरकार का वैट (VAT)
केंद्र Govt की एक्साइज ड्यूटी पूरे देश में असर डालती है, जबकि अलग-अलग राज्यों का VAT पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अंतर पैदा करता है।

केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी पर सवाल
अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी लंबे समय से केंद्र सरकार से एक्साइज ड्यूटी कम करने की मांग करते रहे हैं। उनका कहना है कि केंद्र के पास राज्यों की तुलना में ज्यादा राजस्व स्रोत हैं, इसलिए उसे जनता को राहत देनी चाहिए।
हालांकि केंद्र सरकार का तर्क है कि इन टैक्सों से मिलने वाला राजस्व बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और विकास योजनाओं में लगाया जाता है।
राज्यों का VAT भी बना बहस का मुद्दा
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राज्यों का VAT भी अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है कि अलग-अलग राज्यों में ईंधन के दाम अलग होते हैं।
दिल्ली Govt पर भी सवाल उठते रहे हैं कि वह VAT कम क्यों नहीं करती। आम आदमी पार्टी का कहना है कि राज्य सरकार का राजस्व शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च होता है, इसलिए टैक्स में बड़ी कटौती करना आसान नहीं है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज
ईंधन कीमतों को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच लगातार राजनीतिक टकराव देखने को मिलता है। विपक्ष जहां केंद्र सरकार को महंगाई के लिए जिम्मेदार ठहराता है, वहीं सत्ताधारी पक्ष राज्यों की टैक्स नीति पर सवाल उठाता है।
केजरीवाल का बयान भी इसी राजनीतिक बहस का हिस्सा माना जा रहा है। इससे वे खुद को आम आदमी की आवाज के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा व्यापक असर
लगातार ऊंची ईंधन कीमतों का असर सिर्फ घरेलू बजट तक सीमित नहीं रहता। इससे उद्योगों की लागत बढ़ती है, निवेश प्रभावित होता है और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
यदि लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा पेट्रोल-डीजल पर खर्च करेंगे, तो बाजार में अन्य वस्तुओं की मांग घटेगी, जिससे छोटे कारोबार प्रभावित हो सकते हैं।
कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता भी बड़ी चुनौती
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमत बढ़ने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
जब वैश्विक तेल कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का आयात बिल भी बढ़ता है। इससे रुपये पर दबाव पड़ता है और महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।

इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ता जोर
बढ़ती ईंधन कीमतों ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और नवीकरणीय ऊर्जा की जरूरत को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है।
Govt इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम कर रही है। यदि पेट्रोल-डीजल लगातार महंगे बने रहते हैं, तो लोग स्वाभाविक रूप से EV की ओर आकर्षित होंगे।
ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर अरविंद केजरीवाल का “धीमा जहर” वाला बयान देश में बढ़ती आर्थिक चिंता को सामने लाता है। पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमतें केवल वाहन चालकों को ही प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि पूरे आर्थिक ढांचे पर असर डालती हैं।
राजनीतिक बहस के बीच आम नागरिक आज भी राहत की उम्मीद लगाए बैठा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थायी समाधान के लिए टैक्स ढांचे में संतुलन और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेज बदलाव जरूरी होगा।
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