Calcutta हाईकोर्ट ने ममता कैंप को राहत देने से किया इनकार, ऋतब्रत बनर्जी फिलहाल बंगाल के LoP बने रहेंगे
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रही सियासी लड़ाई को कलकत्ता हाईकोर्ट के ताजा आदेश से नया मोड़ मिल गया है। अदालत ने ममता बनर्जी समर्थक खेमे को तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) के रूप में नियुक्ति पर फिलहाल रोक नहीं लगाई है। इसका सीधा मतलब है कि ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर बने रहेंगे, हालांकि उनकी नियुक्ति पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
18 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति शम्पा सरकार और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष का ऋतब्रत बनर्जी को LoP नियुक्त करने का फैसला फिलहाल अस्थायी यानी provisional है और न्यायिक समीक्षा के अधीन है। अदालत ने मामले को एकल पीठ के पास वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि इस विवाद पर दो महीने के भीतर फैसला किया जाए।
ममता खेमे की याचिका पर क्या हुआ?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने 3 जून 2026 को ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी। इसके खिलाफ वरिष्ठ TMC विधायक शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। ममता बनर्जी समर्थक खेमे ने शोभनदेब को LoP पद के लिए अपना उम्मीदवार बताया था और आरोप लगाया कि अध्यक्ष ने पार्टी की पसंद को नजरअंदाज करते हुए ऋतब्रत को मान्यता दी।
ममता खेमे की दलील थी कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुनने की प्रक्रिया में संबंधित राजनीतिक दल की राय और उसके अधिकृत निर्णय को महत्व दिया जाना चाहिए। वहीं ऋतब्रत समर्थक गुट का दावा रहा कि विधानसभा में वास्तविक संख्या बल और विधायकों का समर्थन ज्यादा महत्वपूर्ण है।
यही सवाल अब पूरे विवाद के केंद्र में है—क्या LoP का फैसला पार्टी नेतृत्व की सिफारिश के आधार पर होना चाहिए या विधानसभा में विपक्षी विधायकों के समर्थन के आधार पर?
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं लगाई रोक?
अदालत ने तत्काल रोक लगाने से इनकार जरूर किया, लेकिन उसने विधानसभा अध्यक्ष की कार्रवाई को पूरी तरह सही भी नहीं ठहराया है। ताजा आदेश में खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया कहा कि अध्यक्ष को दोनों गुटों को बुलाकर उनके संबंधित दस्तावेज और समर्थन के प्रमाण देखने चाहिए थे। साथ ही राजनीतिक दल के संविधान, नियमों और आंतरिक प्रक्रियाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए था।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि अध्यक्ष की कार्रवाई लोकतांत्रिक सिद्धांतों, निष्पक्षता और तटस्थता के अनुरूप थी या नहीं, इसका विस्तृत फैसला एकल पीठ को करना होगा। इस तरह हाईकोर्ट ने तत्काल स्थिति को बदलने के बजाय अंतिम कानूनी निर्णय के लिए रास्ता खुला रखा है।
यानी यह फैसला ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति को अंतिम वैधानिक मुहर नहीं देता। उन्हें फिलहाल पद पर बने रहने की अनुमति मिली है, जबकि नियुक्ति की वैधता पर अंतिम फैसला बाद में होगा।
ऋतब्रत बनर्जी को मिली अस्थायी राहत
Calcutta हाईकोर्ट के आदेश से तत्काल राजनीतिक फायदा ऋतब्रत बनर्जी के खेमे को मिला है। वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते रहेंगे और सदन में विपक्ष के प्रमुख चेहरे के तौर पर काम कर सकेंगे। अदालत ने उनकी नियुक्ति पर तत्काल रोक नहीं लगाई है।
हालांकि उनकी स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। अदालत ने साफ किया है कि नियुक्ति फिलहाल दो महीने की अवधि तक प्रभावी रहेगी और इस दौरान एकल पीठ को मामले पर फैसला करना होगा। इसलिए ऋतब्रत के लिए यह स्थायी जीत नहीं, बल्कि फिलहाल की कानूनी बढ़त है।
इससे विधानसभा में विपक्ष की भूमिका को लेकर भी स्थिति स्पष्ट बनी रहेगी। जब तक एकल पीठ कोई अलग आदेश नहीं देती, ऋतब्रत बनर्जी LoP के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।
विवाद के पीछे TMC का बड़ा आंतरिक संघर्ष
LoP पद को लेकर कानूनी लड़ाई दरअसल तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे बड़े सत्ता संघर्ष का एक हिस्सा है। 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद पार्टी के भीतर दो अलग-अलग गुटों के सामने आने से राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट खुद को पार्टी के वास्तविक संगठनात्मक प्रतिनिधित्व का दावेदार बता रहा है, जबकि ममता बनर्जी का खेमे पार्टी पर अपना नियंत्रण कायम रखने की कोशिश कर रहा है।
जून में ऋतब्रत खेमे ने विधानसभा में अपने समर्थन का दावा करते हुए उन्हें विपक्ष का नेता बनाए जाने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया था। रिपोर्टों के मुताबिक 58 विधायकों ने उनके पक्ष में आवेदन या प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। दूसरी ओर ममता समर्थक गुट ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को LoP पद के लिए नामित किया था।
यही दोहरे दावे बाद में कानूनी विवाद में बदल गए।
पहले भी अदालत ने तत्काल राहत नहीं दी थी
यह पहली बार नहीं है जब हाईकोर्ट ने ऋतब्रत की नियुक्ति पर तत्काल रोक लगाने से इनकार किया है। 18 जून को न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने भी अंतरिम राहत देने से इनकार किया था और संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। उस समय भी अदालत ने अध्यक्ष के फैसले को तत्काल प्रभाव से निलंबित नहीं किया था।
इसके बाद मामला खंडपीठ के सामने पहुंचा। जुलाई में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने अपना आदेश सुरक्षित रखा था। अब 18 अगस्त के आदेश में अदालत ने मामले को आगे की विस्तृत सुनवाई के लिए एकल पीठ के पास भेज दिया है।
अब आगे क्या होगा?
अब इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका एकल पीठ के फैसले की होगी। उसे यह तय करना होगा कि विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करते समय सही संवैधानिक और प्रक्रियात्मक रास्ता अपनाया था या नहीं।
अदालत को यह भी देखना होगा कि पार्टी की ओर से शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम की सिफारिश कितनी प्रभावी थी और विधानसभा में ऋतब्रत के समर्थन का दावा किस तरह से प्रमाणित किया गया। साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी के भीतर चल रहे विवाद का विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन पर कितना प्रभाव पड़ना चाहिए।
हाईकोर्ट ने संकेत दिया है कि इन सवालों का फैसला केवल राजनीतिक दावों के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेजों, पार्टी के नियमों और विधानसभा की प्रक्रिया को ध्यान में रखकर किया जाएगा।
ममता कैंप के लिए सियासी झटका
ताजा आदेश को ममता बनर्जी समर्थक खेमे के लिए तत्काल राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। उसकी कोशिश थी कि ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति पर रोक लगाकर शोभनदेब चट्टोपाध्याय को LoP पद पर मान्यता दिलाने की दिशा में रास्ता साफ हो। लेकिन अदालत ने फिलहाल ऐसा करने से इनकार कर दिया।
दूसरी ओर, ऋतब्रत कैंप इस फैसले को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण बढ़त के तौर पर देख सकता है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी नियुक्ति पर अंतिम कानूनी फैसला अभी बाकी है।
इसलिए आने वाले दो महीने पश्चिम बंगाल की राजनीति और विधानसभा दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। एक ओर अदालत यह तय करेगी कि अध्यक्ष की प्रक्रिया कानूनी रूप से कितनी मजबूत थी, वहीं दूसरी ओर TMC के दोनों गुट अपने-अपने समर्थन और संगठनात्मक दावों को मजबूत करने की कोशिश करेंगे।
निष्कर्ष
कलकत्ता हाईकोर्ट का ताजा फैसला ऋतब्रत बनर्जी के लिए फिलहाल राहत और ममता बनर्जी खेमे के लिए झटका है। अदालत ने उनकी LoP नियुक्ति पर तत्काल रोक नहीं लगाई और उन्हें कम से कम अगले दो महीने तक पद पर बने रहने का रास्ता साफ कर दिया है।
लेकिन इसे ऋतब्रत की स्थायी जीत या ममता खेमे की अंतिम हार कहना जल्दबाजी होगी। असली फैसला अब एकल पीठ की सुनवाई के बाद आएगा। इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों, पार्टी के आंतरिक निर्णय, विधायकों के संख्या बल और लोकतांत्रिक निष्पक्षता जैसे महत्वपूर्ण सवाल जुड़े हुए हैं।
फिलहाल इतना तय है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी ही नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे और TMC का आंतरिक सत्ता संघर्ष अदालत की निगरानी में आगे बढ़ेगा। अगले दो महीने का न्यायिक फैसला न केवल LoP पद का भविष्य तय करेगा, बल्कि बंगाल की राजनीति में TMC के भीतर शक्ति संतुलन पर भी दूरगामी असर डाल सकता है।

