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Sukhbir बादल ने पंजाब सरकार पर साधा निशाना, 3 लाख कर्मचारियों के सामूहिक अवकाश को बताया गंभीर संकट

चंडीगढ़: पंजाब में सरकारी कर्मचारियों के बड़े पैमाने पर सामूहिक अवकाश और ‘महा हड़ताल’ ने राज्य की राजनीति को गरमा दिया है। गुरुवार, 27 अगस्त 2026 को राज्य के तीन लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी अपनी लंबित मांगों को लेकर सामूहिक आकस्मिक अवकाश पर चले गए। इस आंदोलन के बाद शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान पर तीखा हमला बोला। बादल ने कहा कि कर्मचारियों का इतने बड़े स्तर पर विरोध सरकार की विफलता और कर्मचारियों की समस्याओं के प्रति उसकी कथित उदासीनता को दर्शाता है।

तीन लाख से अधिक कर्मचारी सामूहिक अवकाश पर

पंजाब के विभिन्न सरकारी विभागों, बोर्डों और निगमों से जुड़े तीन लाख से अधिक कर्मचारियों ने 27 अगस्त को सामूहिक आकस्मिक अवकाश लिया। कर्मचारी संगठनों ने इसे ‘महा हड़ताल’ का नाम दिया। आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा लंबित महंगाई भत्ते (DA) के बकाये का भुगतान है। इसके अलावा कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना लागू करने, वेतनमान से जुड़े सुधार, केंद्रीय कर्मचारियों के समान लाभ और नए कर्मचारियों के तीन साल के प्रोबेशन पीरियड को समाप्त करने जैसी मांगें भी उठा रहे हैं।

Sukhbir Badal slams Punjab govt as 3 lakh employees go on mass leave

कर्मचारी संगठनों के अनुसार, DA का कुल बकाया करीब ₹20,161 करोड़ है। उनका दावा है कि कर्मचारियों को फिलहाल मूल वेतन का 42 प्रतिशत DA मिल रहा है, जबकि उनके अनुसार लागू दर 58 प्रतिशत होनी चाहिए। इस अंतर के कारण बड़ी रकम लंबे समय से लंबित है। हालांकि, पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा है कि सरकार बकाया राशि को चरणबद्ध तरीके से जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है।

सुखबीर बादल ने सरकार पर बोला हमला

शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने चंडीगढ़ स्थित पंजाब सचिवालय में कर्मचारियों के विरोध की तस्वीरें और वीडियो साझा करते हुए भगवंत मान सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि तीन लाख से अधिक कर्मचारी लंबित DA बकाये की मांग को लेकर अवकाश पर चले गए हैं।

बादल ने इसे पंजाब सरकार के लिए शर्मनाक स्थिति बताया और आरोप लगाया कि सरकार की जनसंपर्क गतिविधियां वास्तविक स्थिति को छिपा नहीं सकतीं। उन्होंने सरकार पर कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान करने में विफल रहने का आरोप लगाया।

बादल की प्रतिक्रिया को आगामी 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव के राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। SAD लंबे समय से पंजाब की राजनीति में AAP सरकार की नीतियों और प्रशासनिक फैसलों पर हमला करता रहा है। सरकारी कर्मचारियों का इतना बड़ा आंदोलन विपक्ष को सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का अवसर देता है।

सरकारी कामकाज पर पड़ा व्यापक असर

कर्मचारियों के सामूहिक अवकाश के कारण पंजाब में सरकारी कामकाज प्रभावित हुआ। सचिवालय और जिला प्रशासन से लेकर स्कूलों, कॉलेजों, तहसीलों, राजस्व कार्यालयों और सरकारी अस्पतालों की नियमित सेवाओं पर असर पड़ा। सरकारी अस्पतालों में OPD सेवाएं भी प्रभावित हुईं।

हालांकि, आंदोलन के दौरान आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को बंद नहीं किया गया। कर्मचारी संगठनों ने इसे पूर्ण बंद या ‘बंद’ के बजाय एक दिन की सामूहिक छुट्टी और विरोध बताया। निजी संस्थानों और बाजारों को भी आंदोलन से बाहर रखा गया।

लगभग चार लाख पेंशनरों और बड़ी संख्या में संविदा कर्मचारियों ने भी आंदोलन को समर्थन दिया। इससे कर्मचारियों का विरोध केवल सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह व्यापक कर्मचारी-पेंशनर आंदोलन का रूप लेता दिखाई दिया।

DA के अलावा कई मांगें

कर्मचारियों की मांग सिर्फ महंगाई भत्ते के भुगतान तक सीमित नहीं है। कर्मचारी संगठन लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा वे केंद्रीय कर्मचारियों के अनुरूप लाभ, वेतनमान में सुधार और नए कर्मचारियों के लिए तीन साल की प्रोबेशन अवधि खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

DA बकाये का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इससे बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। उनके अनुसार, महंगाई बढ़ने के बावजूद बकाया राशि का समय पर भुगतान नहीं होने से कर्मचारियों पर वित्तीय दबाव बढ़ा है।

सरकार और कर्मचारियों के बीच बातचीत पर गतिरोध

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत की पहल की थी, लेकिन आंदोलन के दिन प्रस्तावित बैठक अंतिम समय में रद्द हो गई। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर कहा कि सरकार हर मुद्दे को बातचीत के जरिए हल करने के लिए तैयार है, लेकिन बातचीत और हड़ताल एक साथ नहीं चल सकतीं।

कर्मचारी नेताओं ने सरकार के रुख पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि उन्हें ऐसी बैठक का प्रस्ताव मिला था जिसमें पहले आंदोलन वापस लेने की शर्त शामिल थी। कर्मचारी प्रतिनिधियों ने इसे स्वीकार नहीं किया और विरोध जारी रखा। इस घटनाक्रम ने सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच विश्वास की कमी को और उजागर किया है।

सरकार के सामने वित्तीय चुनौती

DA के बकाये का भुगतान राज्य सरकार के लिए सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि वित्तीय चुनौती भी है। कर्मचारी संगठनों के अनुसार कुल लंबित राशि ₹20,161 करोड़ है। इसमें करीब ₹6,000 करोड़ 2021 के बाद की अवधि से जुड़ा बताया गया है, जबकि बाकी राशि उससे पहले के बकाये की है।

राज्य सरकार को एक ओर कर्मचारियों की मांगों पर निर्णय लेना है, वहीं दूसरी ओर पहले से मौजूद वित्तीय दबाव को भी ध्यान में रखना होगा। यदि सरकार एकमुश्त बड़ी राशि जारी करती है, तो इसका राज्य के बजट पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, भुगतान में लगातार देरी राजनीतिक और प्रशासनिक असंतोष को बढ़ा सकती है।

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आंदोलन का अगला चरण

कर्मचारी संगठनों ने संकेत दिया है कि 28 और 29 अगस्त को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन जारी रहेगा। इन प्रदर्शनों में मुख्यमंत्री के पुतले जलाने और उनके सोशल मीडिया संदेश की प्रतियां फाड़ने जैसे कार्यक्रम भी प्रस्तावित हैं। 30 अगस्त को लुधियाना में संयुक्त कार्रवाई समिति की बैठक होगी, जिसमें आंदोलन की अगली रणनीति तय की जाएगी।

इससे स्पष्ट है कि विवाद फिलहाल एक दिन के सामूहिक अवकाश तक सीमित रहने वाला नहीं दिख रहा। यदि सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बातचीत से समाधान नहीं निकलता है, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और व्यापक हो सकता है।

2027 चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव

पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। ऐसे में तीन लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों का आंदोलन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सरकारी कर्मचारी और पेंशनर राज्य में एक बड़ा मतदाता समूह हैं। यदि उनकी मांगों का समाधान नहीं होता है, तो इसका राजनीतिक प्रभाव चुनावी बहस में दिखाई दे सकता है।

सुखबीर बादल और SAD के लिए यह आंदोलन AAP सरकार को घेरने का अवसर है। वहीं सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह कर्मचारियों की मांगों को बातचीत के जरिए सुलझाए और प्रशासनिक कामकाज को सामान्य बनाए रखे।

निष्कर्ष

पंजाब में तीन लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों के सामूहिक अवकाश ने भगवंत मान सरकार के सामने गंभीर प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। लंबित DA, पुरानी पेंशन योजना और वेतन संबंधी मांगों को लेकर कर्मचारियों का असंतोष अब बड़े राज्यव्यापी आंदोलन में बदल गया है।

सुखबीर सिंह बादल ने इस स्थिति को AAP सरकार की विफलता बताते हुए तीखा हमला बोला है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि वह कर्मचारियों के मुद्दों पर बातचीत और चरणबद्ध समाधान के लिए तैयार है, लेकिन हड़ताल के साथ बातचीत संभव नहीं है।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत कब शुरू होती है और क्या सरकार लंबित वित्तीय दावों तथा अन्य मांगों पर ठोस समयबद्ध समाधान पेश कर पाती है। यदि गतिरोध लंबा खिंचता है, तो इसका असर सरकारी सेवाओं के साथ-साथ पंजाब की चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है।

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