CJP विरोध दिवस 21: वांगचुक बोले— भूख ‘स्थिर’ हो गई है, हटाने की कोशिश हुई तो होगा बड़ा विरोध
नई दिल्ली: जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख के सामाजिक सुधारक सोनम वांगचुक के नेतृत्व में चल रहे सीजेपी (क्लाइमेट जस्टिस प्रोटेस्ट) आंदोलन का शनिवार को 21वां दिन पूरा हो गया। लंबे समय से जारी अनशन के बीच वांगचुक ने कहा कि उनकी भूख अब “स्थिर” हो गई है और शरीर ने इस स्थिति के साथ खुद को किसी हद तक अनुकूलित कर लिया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि प्रशासन उन्हें या अन्य प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाने की कोशिश करता है, तो इसका लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक विरोध किया जाएगा।
CJP वांगचुक ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि यह आंदोलन केवल लद्दाख का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश के पर्यावरण, जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा का संघर्ष है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी सरकार या राजनीतिक दल का विरोध करना नहीं, बल्कि उन नीतियों पर ध्यान आकर्षित करना है जो हिमालयी क्षेत्रों के पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के भविष्य को प्रभावित कर सकती हैं।
उन्होंने कहा, “21 दिनों के बाद अब भूख की अनुभूति पहले जैसी नहीं रही। शरीर एक अलग अवस्था में पहुंच जाता है, लेकिन हमारा संकल्प पहले से कहीं अधिक मजबूत है।”
आंदोलन की प्रमुख मांगें
वांगचुक और उनके सहयोगियों की मुख्य मांग है कि हिमालयी क्षेत्रों, विशेषकर लद्दाख, को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र मानते हुए विशेष संवैधानिक और कानूनी संरक्षण दिया जाए। उनका कहना है कि अनियंत्रित औद्योगिक विकास, खनन और बड़े निर्माण कार्य इस क्षेत्र के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
प्रदर्शनकारी यह भी चाहते हैं कि स्थानीय लोगों को भूमि, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक अधिकार मिले तथा विकास योजनाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
स्वास्थ्य पर नजर
अनशन के 21वें दिन भी चिकित्सकों की CJP नियमित रूप से वांगचुक और अन्य अनशनकारियों के स्वास्थ्य की निगरानी कर रही है। डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक भोजन न लेने से शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए लगातार चिकित्सा परीक्षण आवश्यक है।
हालांकि वांगचुक ने कहा कि वे चिकित्सकीय सलाह का पालन कर रहे हैं और नियमित स्वास्थ्य जांच करवा रहे हैं। उन्होंने समर्थकों से अपील की कि वे आंदोलन के दौरान किसी भी प्रकार की हिंसा या अव्यवस्था से बचें।
प्रशासन को चेतावनी
वांगचुक ने कहा कि यदि प्रशासन आंदोलन स्थल को खाली कराने या प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक हटाने की कोशिश करता है, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। उन्होंने कहा कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में चल रहा है।
उन्होंने कहा, “अगर हमें जबरन हटाने का प्रयास किया गया तो देशभर के नागरिक लोकतांत्रिक तरीके से इसका विरोध करेंगे। हमारा संघर्ष अहिंसक है और आगे भी ऐसा ही रहेगा।”
देशभर से मिल रहा समर्थन
इस आंदोलन को विभिन्न सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों, छात्र समूहों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का समर्थन मिल रहा है। कई स्थानों पर एकजुटता रैलियां, हस्ताक्षर अभियान और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।
समर्थकों का कहना है कि हिमालय केवल लद्दाख की पहचान नहीं है, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की जल सुरक्षा और जलवायु संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में वहां के पर्यावरण की रक्षा राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकार की प्रतिक्रिया
केंद्र सरकार की ओर से अब तक इस आंदोलन पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि सरकारी सूत्रों का कहना है कि लद्दाख के विकास, बुनियादी ढांचे और स्थानीय हितों से जुड़े मुद्दों पर विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श जारी है।
प्रशासन का कहना है कि क्षेत्र के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं आंदोलनकारी चाहते हैं कि उनकी मांगों पर ठोस और समयबद्ध निर्णय लिया जाए।
शांतिपूर्ण आंदोलन पर जोर
वांगचुक ने अपने संबोधन में एक बार फिर स्पष्ट किया कि आंदोलन पूरी तरह गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने समर्थकों से कहा कि किसी भी उकसावे में न आएं और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखते रहें।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संवाद सबसे प्रभावी माध्यम है और सरकार को भी नागरिकों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण का बड़ा संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि वांगचुक का आंदोलन केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। यह जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, जल संकट और टिकाऊ विकास जैसे व्यापक मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस को भी आगे बढ़ा रहा है।
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान, बदलते मौसम और प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को देखते हुए पर्यावरणविद लंबे समय से संवेदनशील क्षेत्रों के लिए विशेष संरक्षण की मांग करते रहे हैं।
आगे की रणनीति
आंदोलन के आयोजकों ने संकेत दिया है कि यदि सरकार की ओर से सार्थक वार्ता का प्रस्ताव आता है तो वे बातचीत के लिए तैयार हैं। लेकिन जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस आश्वासन नहीं मिलता, तब तक शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रहेगा।
21 दिनों के इस लंबे संघर्ष के बाद भी वांगचुक ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि समाधान है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकार किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का प्रश्न हैं। ऐसे में सरकार, नागरिक समाज और सभी संबंधित पक्षों को मिलकर ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सके।

