महाराष्ट्र SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग को नोटिस; मतदाता सूची संशोधन पर रोक लगाने से इनकार
नई दिल्ली | 26 अक्टूबर 2026 | न्यायपालिका और चुनाव
महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision — SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को महत्वपूर्ण सुनवाई की। अदालत ने मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के आरोपों पर भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। हालांकि, अदालत ने तत्काल मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया रोकने या दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समय-सीमा बढ़ाने का आदेश देने से इनकार कर दिया।
SC भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का पक्ष सुने बिना जल्दबाजी में अंतरिम आदेश देना उचित नहीं होगा। मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में नाम शामिल होना नागरिक के मतदान के अधिकार के इस्तेमाल के लिए आवश्यक है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम भी हटाए गए हो सकते हैं, जो पहले से पंजीकृत थे और केवल अपने पुराने पते पर उपलब्ध नहीं मिले।
1. क्या है पूरा मामला?
महाराष्ट्र में चुनाव आयोग मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कर रहा है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और मृत, डुप्लीकेट या अपात्र मतदाताओं के नामों की पहचान करना है। लेकिन महाराष्ट्र में इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता अरुण आनंदगिरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार ने अदालत को बताया कि महाराष्ट्र में लगभग नौ करोड़ मतदाताओं वाली सूची से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि लगभग तीन करोड़ मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं।
हालांकि, ये आंकड़े याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में रखे गए दावे हैं। इनका अंतिम सत्यापन और नाम हटाने के कारणों का आकलन सुनवाई के दौरान होना बाकी है।
2. मुंबई और पुणे में पुनर्विकास परियोजनाओं का मुद्दा
SC याचिका में मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहरों में चल रही पुनर्विकास परियोजनाओं का विशेष उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, इन शहरों में कई पुरानी इमारतों और आवासीय परिसरों का पुनर्विकास हो रहा है। इसके चलते हजारों परिवारों को अस्थायी रूप से दूसरे स्थानों पर रहना पड़ सकता है। ऐसे लोगों के पुराने पते पर नहीं मिलने के कारण उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की आशंका जताई गई है।
याचिका में कहा गया कि कुछ मतदाताओं को रिकॉर्ड में “Person Not Found” यानी व्यक्ति उपलब्ध नहीं होने की श्रेणी में रखा गया। यदि कोई व्यक्ति केवल स्थान परिवर्तन के कारण पुराने पते पर नहीं मिलता, तो उसकी पात्रता और वास्तविक निवास की जांच किए बिना नाम हटाना विवाद का विषय बन सकता है।
इस मामले का मुख्य प्रश्न यही है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त सत्यापन और शिकायत निवारण की व्यवस्था है या नहीं।
3. करीब 1.22 करोड़ मतदाताओं पर ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ का सवाल
याचिका में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा ‘Logical Discrepancy’ यानी तार्किक विसंगति के आधार पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने का है।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में दावा किया कि लगभग 1.22 करोड़ मतदाताओं के नाम इस श्रेणी में हटाए गए हैं। उनका कहना था कि इतनी बड़ी संख्या में नाम प्रभावित होने के कारण पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और सत्यापन प्रणाली की जांच आवश्यक है।
SC यहां यह समझना जरूरी है कि किसी रिकॉर्ड में विसंगति मिलना और किसी मतदाता का अपात्र होना एक ही बात नहीं है। विवाद इस बात पर है कि ऐसी विसंगतियों की जांच कैसे की गई और प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिला या नहीं।
4. Form 6 को लेकर क्यों उठे सवाल?
सुनवाई के दौरान एक प्रमुख मुद्दा Form 6 का भी रहा। यह फॉर्म सामान्यतः नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में थे, लेकिन SIR के दौरान हटा दिए गए, उन्हें दोबारा नाम जुड़वाने के लिए Form 6 भरने को कहना उचित नहीं है। वकील ने आशंका जताई कि इस फॉर्म में पहले से मतदाता के रूप में पंजीकृत न होने संबंधी घोषणा के कारण प्रभावित लोगों के सामने कानूनी परेशानी खड़ी हो सकती है।
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट आश्वासन दिया:
“Nobody will be prosecuted.” यानी किसी को भी मुकदमे का सामना नहीं करना पड़ेगा।
अदालत ने इस आशंका पर राहत देने वाला बयान दिया, लेकिन अलग फॉर्म बनाने की मांग और पुनरीक्षण की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
5. सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक क्यों नहीं लगाई?
अदालत ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया, लेकिन तत्काल समय-सीमा बढ़ाने या अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की पूरी प्रक्रिया को सही ठहरा दिया है। अदालत ने फिलहाल आयोग का पक्ष सुनने से पहले अंतरिम राहत देने से परहेज किया है।
SC मुख्य न्यायाधीश ने यह भी संकेत दिया कि यदि सुनवाई के दौरान यह सामने आता है कि लोगों को जरूरी दस्तावेज जमा करने या आपत्तियां दर्ज कराने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है, तो अदालत समय-सीमा बढ़ाने पर विचार कर सकती है।
6. आगे क्या होगा?
मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर 2026 को होगी। तब चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर अदालत आगे की दिशा तय कर सकती है।
मुख्य रूप से तीन सवालों पर ध्यान रहेगा:
क्या मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में पर्याप्त सत्यापन किया गया?
पहले से पंजीकृत मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के लिए उचित प्रक्रिया क्या होनी चाहिए?
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