इजरायल चुनाव 2026: नेतन्याहू के सामने कौन हैं प्रमुख चुनौतीकर्ता, क्या विपक्ष बदल सकता है सत्ता?
इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले आम चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले, गाजा युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उठे सवालों और घरेलू राजनीतिक विवादों के बाद मतदाता यह तय करेंगे कि नेतन्याहू को सत्ता में बने रहना चाहिए या देश को नया नेतृत्व मिलना चाहिए।
इस चुनाव में नेतन्याहू का मुकाबला केवल किसी एक नेता से नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारधाराओं वाले विपक्षी दलों के गठबंधन से है। पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड सहित कई नेता उन्हें चुनौती दे रहे हैं।
रॉयटर्स की 26 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव से ठीक पहले मुकाबला काफी करीबी हो गया है। सर्वेक्षणों में किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा। इसलिए चुनाव का परिणाम आने के बाद सरकार बनाने के लिए छोटे दलों का समर्थन और गठबंधन की बातचीत निर्णायक हो सकती है।
1. बेंजामिन नेतन्याहू: सत्ता बचाने की चुनौती
बेंजामिन नेतन्याहू
लिकुड पार्टी | मौजूदा प्रधानमंत्री
नेतन्याहू 2009 से अधिकांश समय इजरायल की सत्ता में रहे हैं। उनके समर्थक उन्हें अनुभवी नेता और सुरक्षा मामलों में मजबूत निर्णय लेने वाला प्रधानमंत्री मानते हैं। लेकिन 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था की विफलताओं और उनकी सरकार की नीतियों को लेकर उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है।
नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलों में भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा मुकदमा भी शामिल है, जिन्हें वह खारिज करते रहे हैं। गाजा युद्ध के दौरान उनकी सरकार की नीतियों और अति-दक्षिणपंथी सहयोगियों पर निर्भरता ने भी घरेलू राजनीति में विवाद पैदा किए हैं।
हालांकि, नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की राजनीति के प्रमुख खिलाड़ी रहे हैं और कई बार मुश्किल परिस्थितियों से वापसी कर चुके हैं। उनकी पार्टी लिकुड और धार्मिक रूढ़िवादी तथा दक्षिणपंथी दलों का समर्थन उन्हें सत्ता में बने रहने का रास्ता दे सकता है।
2. गादी आइजेनकोट: नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी
गादी आइजेनकोट
याशार पार्टी | पूर्व सैन्य प्रमुख
गादी आइजेनकोट नेतन्याहू के प्रमुख चुनौतीकर्ताओं में शामिल हैं। इजरायल की सेना के पूर्व प्रमुख रहे आइजेनकोट ने सुरक्षा, सरकारी जवाबदेही और संस्थागत सुधारों को अपने अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
आइजेनकोट की राजनीतिक छवि एक ऐसे नेता की है जो सैन्य अनुभव के साथ सत्ता के मौजूदा नेतृत्व से अलग विकल्प पेश करना चाहते हैं। गाजा में लड़ाई के दौरान उनके बेटे की मौत ने भी उनके सार्वजनिक जीवन और सुरक्षा संबंधी विचारों को चर्चा में रखा है।
उन्होंने 7 अक्टूबर के हमले से जुड़ी सुरक्षा विफलताओं की स्वतंत्र जांच की मांग की है। यह मुद्दा उन मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो जानना चाहते हैं कि हमले से पहले सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक नेतृत्व ने क्या कदम उठाए थे।
रॉयटर्स के मुताबिक, आइजेनकोट की याशार पार्टी कई सर्वेक्षणों में मजबूत प्रदर्शन करती दिखी है। हालांकि, उनकी Israel
3. नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड: साझा चुनौती, अलग विचारधाराएं
नफ्ताली बेनेट
पूर्व प्रधानमंत्री | दक्षिणपंथी पृष्ठभूमि
बेनेट पहले नेतन्याहू के सहयोगी रह चुके हैं, लेकिन अब उन्हें सत्ता से हटाने की कोशिश कर रहे विपक्षी नेताओं में शामिल हैं। उनका अभियान राष्ट्रीय एकता, शासन में सुधार और देश को मौजूदा राजनीतिक गतिरोध से बाहर निकालने पर केंद्रित है।
यायर लैपिड
पूर्व प्रधानमंत्री | मध्यमार्गी नेता
लैपिड नेतन्याहू के प्रमुख राजनीतिक विरोधियों में रहे हैं। उनकी राजनीति में धर्म और राज्य के संबंध, नागरिक अधिकार, शासन की जवाबदेही और उदारवादी नीतियां प्रमुख हैं। इस चुनाव में वह बेनेट के साथ मिलकर विपक्षी ताकतों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं।
बेनेट और लैपिड की साझेदारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों अलग राजनीतिक पृष्ठभूमियों से आते हैं। 2021 में भी उन्होंने अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को साथ लाकर नेतन्याहू को सत्ता से बाहर किया था। हालांकि, वह सरकार 2022 में गिर गई थी।
इस बार उनकी B’Yachad यानी ‘साथ मिलकर’ गठबंधन के सामने भी यही चुनौती है कि नेतन्याहू का विरोध करने वाले मतों को एक स्थिर सरकार बनाने योग्य संसदीय समर्थन में कैसे बदला जाए।
4. अविग्दोर लिबरमैन और यायर गोलान की भूमिका
विपक्ष में दो अन्य महत्वपूर्ण नेता भी हैं।
अविग्दोर लिबरमैन: पूर्व रक्षा मंत्री और यिस्राएल बेतेनु पार्टी के प्रमुख। वह सुरक्षा के मामले में सख्त रुख रखते हैं, लेकिन नेतन्याहू की राजनीतिक रणनीति और धार्मिक दलों पर उनकी निर्भरता के आलोचक हैं।
यायर गोलान: पूर्व सैन्य अधिकारी और डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता। उनकी राजनीति में वामपंथी विचार, लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही महत्वपूर्ण हैं।
इन नेताओं का समर्थन विपक्षी गठबंधन को मजबूत कर सकता है। लेकिन सुरक्षा नीति, फिलिस्तीनियों के प्रति दृष्टिकोण और धार्मिक दलों की भूमिका जैसे मुद्दों पर उनके मतभेद गठबंधन की एकता को कठिन बना सकते हैं।
5. चुनावी गणित: सरकार बनाने के लिए 61 सीटें जरूरी
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।
चुनाव से पहले सर्वेक्षणों की तस्वीर
अक्टूबर 2026 के सर्वेक्षणों पर आधारित अनुमान; वास्तविक नतीजे नहीं।
नेतन्याहू का खेमा
लगभग 48–51 सीटें
नेतन्याहू विरोधी दल
लगभग 51–55 सीटें
बहुमत का आंकड़ा: 61 सीटें। सर्वेक्षणों के अनुसार दोनों खेमों को अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
इन अनुमानों को अंतिम चुनाव परिणाम नहीं समझना चाहिए। अलग-अलग सर्वेक्षणों में आंकड़े बदल सकते हैं और कुछ छोटे दलों का प्रदर्शन पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
अरब अल्पसंख्यक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली राम (Ra’am) और जॉइंट लिस्ट जैसी पार्टियां भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन विपक्षी दलों और अरब पार्टियों के बीच सरकार बनाने के लिए किस तरह का समझौता संभव होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
6. विपक्ष की जीत में सबसे बड़ी बाधा क्या है?
विपक्ष के सामने मुख्य समस्या केवल नेतन्याहू की पार्टी को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि चुनाव के बाद एक साझा सरकार बनाना है।
पहली बाधा विचारधाराओं का अंतर है। बेनेट की दक्षिणपंथी राजनीति, लैपिड का मध्यमार्गी दृष्टिकोण और गोलान की वामपंथी विचारधारा कई मुद्दों पर एक-दूसरे से अलग हैं।
दूसरी बाधा फिलिस्तीन और सुरक्षा नीति है। विपक्षी नेता नेतन्याहू की सरकार की आलोचना करते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सभी गाजा, वेस्ट बैंक या फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर एक जैसी नीति अपनाएंगे।
तीसरी बाधा छोटे दलों की भूमिका है। यदि कोई गठबंधन बहुमत से पीछे रह जाता है, तो उसे ऐसे दलों का समर्थन चाहिए होगा जिनके साथ समझौता करना राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है
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